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Friday, 9 March 2018

इच्छा मृत्यु पर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

इच्छा मृत्यु पर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

    नई दिल्ली- इच्छा मृत्यु अर्थात लिंविग विल के मामले में आज सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुना दिया है। कोर्ट ने कुछ शर्तों के साथ इसकी इजाजत दे दी है। इच्छा मृत्यु वसीयत मामले में सुनवाई करते हुए कोर्ट ने कहा कि व्यक्ति को सम्मान से मरने का पूरा हक है। संविधान पीठ ने इसके सुरक्षा उपायोंं के लिए गाइडलाइन जारी की है। इच्छा मृत्यु वह स्थित होती है जब किसी व्यक्ति को मरणासन्न हालत में तकलीफ से बचाने के लिए उसका इलाज करना बंद कर दिया जाता है। ऐसा उस व्यक्ति की मर्जी से किया जाता है।
पिछले साल 11 अक्टूबर को हुई थी इस याचिका पर सुनवाई
    इच्छा मृत्यु की याचिका पर पिछले साल 11 अक्टूबर को कोर्ट द्वारा सुनवाई की गई थी। इस दौरान तब कोर्ट ने मामले पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। कोर्ट ने कहा था कि हम ये कहेंगे कि गरिमापूर्ण मृत्यु पीडा रहित होनी चाहिए। कुछ ऐसी प्रक्रिया होनी चाहिए, जिसमें गरिमपूर्ण तरीके से मृत्यु हो सके।
शीर्ष अदालत में इच्छा मृत्यु को लेकर याचिका दर्ज की गई थी जिसमें कहा गया था कि मृत्यु शैया पर लेटे हुए व्यक्ति को लाइफ सपोर्ट सिस्टम देकर जिंदा रखा जाए या फिर मरने दिया जाए। देश की शीर्ष अदालत ने मामले की सुनवाई करते हुए सवाल उठाया था कि क्या किसी व्यक्ति को उसकी मर्जी के खिलाफ लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर रखकर जीने को मजबूर कर सकते हैं।
     कोर्ट ने ये भी सवाल उठाया था कि जब सम्मान से जीने को अधिकार माना जाता है तो क्यों ना सम्मान के साथ मरने को भी अधिकार माना जाए। ऐसे में अब बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या इच्छा मृत्यु मौलिक अधिकार के दायरे में डाला जाएगा। मामले को लेकर चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने कहा कि हम ये देखेंगे कि इच्छा मृत्यु में यानी इच्छा मृत्यु के लिए वसीयत मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज हो। इस प्रक्रिया के दौरान दो स्वतंत्र गवाह भी मौजूद हों। कोर्ट इस मामले में पर्याप्त सेफगार्ड देगा ताकि इसका दुरुपयोग नहीं हो।
   केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ में इच्छामृत्यु यानी लिविंग विल का विरोध किया था लेकिन पैसिव यूथेनेशिया को मंजूर करते हुए कहा कि इसके लिए कुछ सुरक्षा मानकों के साथ ड्राफ्ट बिल तैयार है।
केंद्र सरकार ने कहा है कि अरूणा शॉनबाग में सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट के आधार पर पैसिव यूथेनेशिया को मंजूर करते हैं जो कि देश का कानून है। इसके तहत जिला और राज्य स्तर पर मेडिकल बोर्ड ऐसे मामलों में पैसिव यूथेनेशिया पर फैसला लेंगे लेकिन केंद्र ने कहा इच्छामृत्यु जिसमें मरीज कहे कि वो अब मेडिकल सपोर्ट नहीं चाहता उसे मंजूर नहीं किया जा सकता।

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