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Sunday, 3 May 2020

पद्मश्री डॉ विष्णु श्रीधर वाकणकर जी के जन्मशताब्दी वर्ष (2019 -2020 ) 4 मई जन्मदिवस पर विशेष

पद्मश्री डॉ विष्णु श्रीधर वाकणकर जी के जन्मशताब्दी वर्ष (2019 -2020 ) 4 मई जन्मदिवस पर विशेष 

डॉ विष्णु श्रीधर वाकणकर 1975 में पद्मश्री से भी अलंकृत किए गए

धार की भोजशाला के इतिहास के मामले में भी वाकणकर जी की महत्वपूर्ण भूमिका रही है

संजय शर्मा संपादक 
हैलो धार पत्रिका 
        डॉ विष्णु श्रीधर वाकणकर (उपाख्य : हरिभाऊ वाकणकर ; 4 मई 1919 – 3 अप्रैल 1988) भारत के एक प्रमुख पुरातत्वविद् थे। उन्होंने भोपाल के निकट भीमबेटका के प्राचीन शिलाचित्रों का अन्वेषण किया। अनुमान है कि यह चित्र १,७५,००० वर्ष पुरानें हैं। इन चित्रों का परीक्षण कार्बन-डेटिंग पद्धति से किया गया, इसीके परिणामस्वरूप इन चित्रों के काल-खंड का ज्ञान होता है। इससे यह भी सिद्ध होता है कि उस समय रायसेन जिले में स्थित भीम बैठका गुफाओं में मनुष्य रहता था और वो चित्र बनाता था। सन १९७५ में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया।
             सदियों पुरानी भारतीय संस्कृति निरंतर प्रवाहमान होकर अपने कार्य के प्रति समर्पण और एकाग्रचित्त होकर कर्मनिष्ठ बने रहने की प्रेरणा देती है। हालांकि, यह सरल नहीं है। पर जीवन का यह सच है। इस सत्य को समर्पित एक व्यक्तित्व था— डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर जी का। मध्यप्रदेश के नीमच में 4 मई, 1919 को उन्होंने अवतरण लिया था। वे संस्कार भारती से सम्बद्ध थे, संस्कार भारती के संस्थापक महामंत्री थे। ज्ञात हो कि संस्कार भारती संगठन कला एवं साहित्य को समर्पित अखिल भारतीय संगठन है। इसकी स्थापना चित्रकार बाबा योगेंद्र जी पद्मश्री (2017) ने 1981 में की।  वर्ष 2019-2020 डॉ. वाकणकर जी का जन्मशताब्दी वर्ष है।
उल्लेखनीय है कि डॉ. वाकणकर जी ने अपना सम्पूर्ण जीवन कला और संस्कृति के शोध, संरक्षण और विस्तार में व्यतीत किया। व्यक्तिगत तौर पर परेशानियाँ सहते और संघर्ष करते हुए, उन्होंने बहुमूल्य पुरातत्त्वीय सामग्री की खोज की। पुरातत्त्वीय कलाकृतियों और शिल्पों के संरक्षण के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया। उन्होंने अपने प्रयास से अनेक आंचलिक संग्रहालय बनवाये  धार की भोजशाला के इतिहास के मामले में भी वाकणकर जी की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उन्हें न अपने स्वास्थ्य की चिंता रहती थी, न खाने की, न विश्राम की। वह लगातार प्रवास, सर्वेक्षण, परीक्षण और शोध-लेखन में व्यस्त रहते थे। इतना ही नहीं, जीवन के अन्तिम क्षणों में भी वह कला-साधना में संलग्न थे। अपनी अनन्त यात्रा के पल में भी उनके हाथ में पेंसिल थी और वह रेखाचित्र बना रहे थे। वास्तव में, उन्होंने अपने काम से भारतीय पुरातत्त्व को अभिनव, अनुपम और बहुमूल्य उपहार दिए, जिसके प्रति राष्ट्र  सदा उनका कृतज्ञ रहेगा।
            पद्मश्री डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर संस्कृति-साधक युगपुरुष थे। भीमबेटका की उनकी खोज विश्वप्रसिद्ध खोज थी। उसके उत्खनन में उन्होंने वर्षों का समय लगाया। उस बीहड़ जंगल में उत्खनन, प्राप्त उपकरणों का वर्गीकरण, उनके चित्र बनवाना, छायाचित्र लेना, लोगों से मिलना, स्थानीय लोककथाओं व गीतों को सुनना, पत्थरों का परीक्षण करना— वर्षों-वर्षों तक उनकी यही दिनचर्या रही। वह पुरातत्त्ववेत्ता होने के साथ, साहित्य, इतिहास, चित्रकला, मूर्तिकला के विषय के भी विद्वान् थे। वह प्रखर कवि और लेखक भी थे। उनकी कविता ‘शबरी के राम’ की कुछ पंक्तियों का उल्लेख करना यहाँ उचित होगा। जिसमें वह लिखते हैं—

घोर वन मध्य में
एक वट वृक्ष था विशाल
युग-युग इतिहास लिए
आश्रय था दे रहा
थके हुए पथिकों को।

         इसमें प्रकृति के साथ मानवीय भाव की सुन्दर अभिव्यक्ति मिलती है। इस काव्यांश से यह भी सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि डॉ. वाकणकर जी बहुत सहृदयी रहे होंगे; क्योंकि जब आप अपने भीतर इन भावों को महसूस करते हैं, तब आपकी लेखनी में ये भाव उतरते हैं।
            ऐसी ही उनकी एक शोधपरक रचना ‘उज्जयिनी का पुरातत्त्व’ पढ़ते हुए, उनकी दूरदृष्टि का अहसास होता है। वह लिखते हैं कि ‘अभी आवश्यकता है नगर में सुव्यवस्थित और सजे-सँवरे दर्शनीय संग्रहालय की। अभी सब कुछ यत्र-तत्र बिखरा पड़ा है। मैंने इतना सारा एकत्र करके इस क्षेत्र को दिया है कि वह लंबे समय तक अध्ययन का विषय हो सकता है। शिप्रा से मिलनेवाली मूर्तियों को उपेक्षित न करके संग्रहालय में स्थापित करना चाहिए। अब घनी जरुरत  है ऐसे आंदोलन की, जो सर्वांगीण संग्रहालय की स्थापना में जुट जाए।’
            इस सन्दर्भ में, यहाँ श्री दत्तोपंत ठेंगड़ी जी का उल्लेख करना उचित होगा। उन्होंने लिखा है कि 1954 में विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन के श्री विष्णु वाकणकर ने प्रागैतिहासिक भारतीय चित्रों के अभिलेख की जानकारी विश्व को देने के लिए एकल-व्यक्ति अभियान छेड़ा। ‘संस्कार भारती’ की भावना वाकणकर जी के एकल-व्यक्ति अभियान के प्रथम दिन ही सजीव और सक्रिय हो गई थी। लखनऊ में संगठन के औपचारिक उद्घाटन के साथ वह साकार भी हो गयी।
            संस्कार भारती के कार्यकर्ताओं का यह सौभाग्य है कि उनके संस्थापक-सदस्यों में से एक पद्मश्री डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर जी का जन्मशताब्दी-वर्ष मनाने का अवसर उन्हें मिला है। वाकणकर जी, संस्कार भारती के महामंत्री भी थे। सन् 1987 में वाकणकर जी के लिए अभिनन्दन-ग्रंथ का प्रकाशन किया गया था। उस ग्रंथ में उन्हें अंतराष्ट्रीय  ख्यातिप्राप्त पुरातत्त्ववेत्ता, कला-आचार्य, मुद्राशास्त्री, साहित्यकार, अभिलेखविद्, भाषाविद्, इतिहासज्ञ, समाजसेवी आदि विशेषणों से अलंकृत किया गया था। ऐसे महान् व्यक्तित्व डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर जी को नमन करते हुए, यह दैनन्दिनी उनको सादर समर्पित है।
            संस्कार भारती ने एक महत्वपूर्ण निर्णय लेते हुए इस महान कलाविद, पुरातत्ववेत्ता, शोधकर्ता, इतिहासकार, महान चित्रकार का जन्म-शताब्दी वर्ष 4 मई 2019 से 3 मई 2020 तक मनाने का सर्वसम्मति से निर्णय लिया है। यह इस विश्व विख्यात कला-साधक को सच्ची श्रद्धाञ्जलि होगी।

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